छओ महीना पहिने के गप्प होयत. ठीक सँ याद नहि आबि रहल अछि. श्री राजीव रँजन लाल जी
पटना गेल छलाह पुस्तक प्रदर्शनी मे. हम हुनका फोन कय कहलिअन्हि जे “खट्टर काका’क तरँग” नेने आऊ. हुनका ई पोथी ते नहि भेटलन्हि मुदा ओहो छोडै वाला जीव नहि. गोविन्द मित्र रोड पर कोनो किताब’क दोकान मे हुनका ई किताब भेटि गेलन्हि. आ ओ हमरा ई किताब पहुँचा देलथिन्ह.
आब मुख्य मुद्दा पर आयल जाए. ओना ते हम एहि किताब’क बारे मे बहुत सुनि चुकल रही, गोरखपूर’क रेलवे लाइब्रेरी मे एकर हिन्दी अनुवाद पढने छलहुँ मुदा मैथिली मे पढबाक तीव्र इच्छा छल. राजीव जी एहि एकरा साकार केलन्हि.
किताब’क भूमिका बहुत नीक लिखल गेल अछि. आ हरिमोहन बाबु जे दूनिया मे ह्यूमर’क सम्राट थीकाह, हमरा बुझने कनिएँ कनिएँ लेल चुकि गेलाह. जेना भूमिका मे लिखल गेल अछि जे ई पोथी पत्रिका मे प्रकाशित अनेक लेख ‘क सँग्रह थीक, ओहि हिसाब सँ ते ठीक मुदा एकेटा कमी महसूस भेल. हम ई बात नहि बुझि सकलहुँ जे एहि किताब’क माध्यम सँ हरिमोहन बाबु’क की मैसेज देबय चहाइत छलाह? हुनकर उद्देश्य की छलन्हि?. की केवल मैथिल’क पोल खोलनाई वा उत्कृष्ट व्यँग वा किछ आओर? किताब पढला सँ मालूम होयत अछि जे टुकड़ा-टुकड़ा मे लिखल गेल एहि किताब कोनो विशेष उद्देश्य नहि. हमरा हिसाब सँ, मनोरँजन’क वास्ते लिखल गेल एहि किताब केँ मनोरँजन लेल केवल पढबाक चाही.
एहि पोथी सँ लेखक’क विद्वता’क अभाष होइत अछि. हुनका सब वेद आ पुरान’क ग्यान छलन्हि से प्रत्येक शीर्षक पढ़ला सँ बुझना जाइत अछि. एहि किताब’क निम्न विशेषता अछि.
किताब’क दू टा कन्ट्रेडिक्ट्री कन्सेप्ट अछि. पहिल ई जे मैथिल सँस्कृति बहुत नीक थीक आ दोसर जे मैथिल सँस्कृति बहुते खराप. मैथिल’क सँस्कृतिक विशेषता ओ चुडा-दही-चीनी नामक चेप्टर सँ केने छथि. पुरे लेख मे ओ चुडा दही चीनी आ मैथिल’क सँस्कार’क वर्णन कयने छथि. जेना उदाहरण’क तौर पर ओ कहैत छथि जे भोजन’क गुणे आदमी’क सँसकार होइत अछि. बङाली मिठाइ खा’ केँ आलसी होइत अछि, पश्चिम’क लोक (यू.पी. आ दिल्ली) के रोटी खा खा केँ कठोर भ’ जाइत अछि आ मैथिल लोकनि चुड़ा दही चीनी खा-खा केँ सरस आ कोमल भेल रहैत छथि. ओ इहो लिखने छथि जे चूकि मैथिल लोकनि अपन भोजन मे खट्टा आ मिरचाय’क प्रयोग हरदम करैत छथि तेँ दुआरे अपना मे ओ कटौझ करैत छथि. हुनकर एकटा चेप्टर चाण्यक्य पर आधारित अछि. पूरे चैप्टर मे ओ आर्गुमेन्ट देने छथि जे चाण्यक्य आओर किओ नहि एकटा मैथिल रहथि. हुनकर तर्क रहनि जे एहेन जिद्दी आ स्वाभिमानी मैथिल छोड़ि आओर किओनहि भ’ सकैत छथि.
एतय तक त ठीक मुदा बाँकी चैप्टर मे ओ मैथिल’क सँस्कृति आ धर्म पर खिद्दान्स कयने छथि. एहि सँस्कृति’क जतेक बुराइ भ’ सकैत छैक ओ ओतेक कयने छथि. हमरा बुझने हरिमोहन बाबु’क सन लेख’क यदि चाहतथि तेँ ओ चुड़ा-दही-चीनी जेकाँ आओर चैप्टर जोडि के पुरा किताबे केँ एकटा उत्कृष्ठ व्यँग बना सकैत छलथि, मुदा धर्म’क आलोचना केला सँ हुनका बेसी लोकप्रियता नहि भेटलन्हि.
अभिव्यक्तिक स्वतँत्रता अपना लोकनि केँ किच्छो करबाक छुट दैत अछि, मुदा एकर मतलब ई नहि जे अपना लोकनि एकटा साधारण मानव केर सँवेदना केँ बिसरि किछो लिखि दी.
ई त भेल पूरा किताब’क निगेटिव चीज. मुदा जे किओ साहित्य सँ प्रेम राखैत छथि आ व्यँग मे रुचि छन्हि हुनका लेल एहि किताब’क जेकाँ कोनो किताब नहिँ. देशी भाषा मे बहुत दम होइत छैक आ देशी भाषाक प्रयोग (अधिकाँश्त: देशज शब्द’क) प्रयोग सँ एहि किताब मे चारि चाँद लागि गेल अछि. एकटा उदाहरण लिअ. खट्टर काका दलान पर बैसल छलाह:- लेखक भोरे भोर महाभारत’क मन्त्र पढि आगू जाति छलाह, जाहि मे यूधिष्ठिर’क बखान छलैक. खट्टर काका कहय लगलाल: हाँ हाँ भोरे भोर कोन अगत्ती सब के नाम लैत छह.
कुल मिला केँ हम इएह लिखब जे हरिमोहन झा जी सन लेखक यदि चाहिथैत तेँ बिना धर्म आ सँस्कृतिक निन्दा केने चुडा-दही-चीनी केँ आगू बढबैत बहुत बढिया लिखि सकैत छलाह. तथापि, यदि साहित्य केर दृष्टि सँ देखल जाए ते व्यँग आ ह्यूमर’क ई किताब एकटा अति विशिष्ठ उदाहरण अछि.
—पद्मनाभ मिश्र
Ahobhagya! Hamahun Harimohan babu k badka fan chhi aa hunka bahute rachna padhwa k soubhagya bhental muda aai dhair ehe udherbun mein rahi ki hunak uddeshya ki chainh. E aalekh padhi bud nik lagal a ichchha hoi aichh ki aur varta kari. Shri Padmanabhji ke e sadprayas ke jatek prasansha kail jai kamme aichh.
सरजी ओना त हम बहुत तुच्छ ग्यान प्राणी छि आ अपन भावना व्यक्त कर मे असमर्थ छि किन्तु एक प्रयत्न अवश्य क रहल छि:
हरिमोहनजी के साहित्यिक ग्यान आ श्क्ति के विषय मे त कोनो शन्के नै किन्तु इ किताब लिख के हुनक उद्देश्य वस्तुत: मनोरन्जने अछि कियेक त ओ स्व्यम लिख्ने छैथ जे ’इ किताब अन्हा के साम्ने अछि पढु आ रस लिय. जन्हा तक क्न्ट्रडिक्सन के प्रश्न अछि हमरा हिसबे हर सिक्का के दु पहलु होइ अछि आ ओ मैथिली समाज के दुनु पह्लु के एहन व्य्न्ग रुप मे प्रस्तुत केने छथि जे मनोरन्जन के अलवा आत्म समिक्षा के अवसर सेहो भेटै अछि. ई किताब पढ्ला पर हमरा म्नोरन्जन के सन्ग मिथिला के प्रति प्रेम आ कर्तव्य के बोध स्वत: होइ अछि. जन्हा तक भगवानक निन्दा के गप अछि ओहि पाछा मनोरन्जने के भाव बुझना जाइ अछि ओ लिखनहो छ्थि जे समय ऐला पर हमर तरन्ग उन्टो दिशा मे बहत. किन्तु शायद ओ समय पूर्व इ दुनिया स विदा भ गेला नै त भ सकय अछि जे आन-आन तरन्ग सेहो देखना मे अबितै. हुनक देहावसान स मैथिली साहित्य के पैघ क्षति पहुचल अछि
2008 Harimohan Jhak Janma shatabdi varsh chiyyaik.Ahank sameeksha sa blog jagat men ahi saalak neek shuruwat bhel chaik.Ahi varsha sab maithili pathak sa agrah je maithili men khoob pothi parhi.
Harimohan Jhak maatr matlab rahain kee puraatan parmparak parabhav hoi.(rudhiwaadi pribritik naash hoi) manoranjanak srijan hunak bhash par majboot pakrak nishani achi.
priye padmnabh ji
harimohan jik aalochna nik nahi lagal,
muda apnek tarkak aagu lachar chhi,
ehi bahane harimohan jik yad taja k rahal chhi
apnek prayas srahniye achhi,
dhanybad